BSc (Ag) 3rd semester
Crop production technology I (Kharif crops)
By – Ajay maurya
Class – BSc (Ag)
University Name - mahatma gandhi kashi vidyapith university
Gmail – mauryaajay49391@gmail.com

• वानस्पतिक नाम: Oryza sativa
• कुल (Family): Gramineae/Poaceae
• गुणसूत्र संख्या (Chromosome number): 2n = 24 ,40
• उत्पत्ति स्थ ान (Origin): इंडो-बमाा (दक्षिण -पूर्व एशिया)
• परागकण (Pollination): यह एक स् व -परातगि फसल (Self-pollinated crop) है।
• पौधे का प्र कार : यह लघु दिवस पौधा (Short day plant) और C3 पौधा है।
• महत्वपूणा िथ्य :
o धान के दाने को कैररओप्ससस (Caryopsis) कहते हैं।
o धान के फूलक्रम को पैतनकल (Panicle) कहते हैं।
o धान के खेत से मीथेन गैस ननकलती है।
o धान की सुगंध स् टाइल 1 के कारण होती है।
भौततक वितरण (Geographical Distribution)
• नर्श्व में चीन, भारत, पानकस्तान , जापान, कोररया, फ़् ांस , लंका, थाईलैंड, नफलीपीन्स , मलेशिया, मयांमार
आदद में संसार की आधे से अधधक जनसंख्या का प्र मुख भोजन — चार्ल है।
• धान की संता से 90% उत्पादन का उपयोग Asia िेत्र में ही है। धान भारत की प्र मुख एर्ं महत्र्पूणव फसल
है।
• भारत के कुल कृनििेत्रफल का लगभग 1/3 भाग पर धान की खेती की जाती है।
• नर्श्व में उगाए जाने र् ाले नर्क्षभन्न फसलों में िेत्रफल की दृ धि से चार्ल का दू सरा स्थ ान है।
आर्थिक महत्व और उपयोग —
• चार्ल का उपयोग नर्क्षभन्न उद्योगों में नकया जाता है।
चार्ल से starch, पाउडर, मादक पदाथव पाए जाते हैं।
नर्िेि रू प से कपडा उद्योग में इसका अधधक उपयोग होता है।
• चार्ल का भूसा (पुआल) का उपयोग जानर्रों के चारे के शलए होता है।
• धान की भूसी से तेल ननकाला जा सकता है। जो खाने के तेल और अन्य उपयोग में आता है।
• इस तेल से साबुन भी तैयार नकया जाता है।
Nutritive Value :
• Protein in white → 6–7%
• Protein in brown → 7–9%
• Carbohydrate → 72.5%
• Fat → 2.2%
• Cellulose → 11.8%

िर्गीकरण (Classification)
धान की मुख्य रू प से तीन नकस्में होती हैं:
1. Oryza sativa: यह एशियाई धान है, जजसकी तीन उप-प्रजानतयां हैं:
o इंतडका (Indica): यह भारत में उगाई जाती है। इसमें पौधे पतले और लंबे होते हैं ।
o जैपोतनका (Japonica): यह जापान में उगाई जाती है। यह बौने व शीघ्र पकने वाले होते हैं ।
o जैवैतनका (Javanica): यह इंडोनेशिया में उगाई जाती है। इसमें तानेवा पत्तियां पतले और हल्के
कलर के होते हैं, और कल्ले कम ननकलते हैं
2. Oryza glaberrima: यह अफ्रीकी धान है।
Climate (जलिायु)
• धान एक उष् ण तथा उपोष् ण जलवायु का फसल है।
• इसकी खेती के ललए उपयुक् त तापमान 21°–30°C होता है।
• धान एक कम प्र काश पसंद करने वाली फसल है।
• मानसून में 125–200 सेमी वार्षिक वषाि वाली स् थथतत धान की खेती के ललए उत्तम है।
• नया पौधा तनकलने की र् वलिन्न अवथथाओं पर 60° F से 90°F (21°C–32°C) तापमान की
आवश्यकता होती है।
• नया फूल आने की समय तापमान 26.5°C से 29.5°C आवश्यक है।
• नया पकने के ललए 20–25°C तापमान की आवश्यकता होती है।
• एवं िरने (दाने िरने) के ललए 25–30°C की आवश्यकता होती है।
Crop Season (फसल का मौसम)
िारत में धान की खेती मुख् यतः तीन मौसमों में की जाती है:
Season (मौसम) Local Name Sowing (बुवाई) Harvesting (कटाई)
खरीफ Aus (7%) (Bihar, W.B.) May – June Sep – Oct
शीत Aman (84%) (India) June – July Nov – Dec
बसंत Boro (9%) (W.B., Odisha) Nov – Dec March – April
Improved Variety (सुधाररत जाततयााँ)
अर्गी जाततयााँ ( Early variety):
• सकेत-4
• गोर्वंद
• मधुरा-22
• पूसा-33
• IR-1
मध्यम जाततयााँ ( Medium variety):
• जया
• IR-8
• IR-24
• सम्राट -52
• माधुरी सुगंधा (आदद ककथमें)
देर से पकने िाली जाततयााँ (Late variety):
• TA-9
• TA-26
• BL-206
• TA-100
उन्नत ककस्में (Varieties)
• जया (Jaya): भारत में नर्कशसत पहली अधव-बौनी नकस्म जजसे "ममरेकल राइस" भी कहा जाता है। इसे
डॉ. िास्त्री ने नर्कशसत नकया था।
• आईआर-8 (IR-8): इसे "तवश्व का जादुई धान" कहा जाता है, जजसका आयात 1965 में भारत में हु आ
था।
• शंकर धान (Hybrid Rice): पूसा बासमिी-1 और DRRH-1 जैसी नकस्में डॉ. ई.ए. शसद्दीकी ने
नर्कशसत की थीं।
• जलगमन (Jalmagan): यह जलभरार् र् ाले िेत्रों में उगाई जाने र् ाली एक नकस्म है।
Soil / pH:

• धान की खेती के ललए पंकी लमट् टी या दोमट लमट् टी सबसे उपयुक् त होती है।
• तथा र् पनका जलधारण अच्छा हो।
• जोमट (दोमट) लमट्टी को उत्तम माना जाता है।
• उपयुक् त pH मान 5.5 – 6.5 होता है।
• pH ज् यादा वाली लमट्टी में िी अच्छी तरह बढ़ता है।
Preparation of field (खेत की तैयारी):
• धान की फसल लेने के ललए एक जुता गहरी (15–20 cm) जुताई प् लाउ से करनी चादहए।
• तथा बोने से पहले 2–3 जुताई देशी या कल् टीवेटर या हैरो से करना लािकारी होता है।
• पडललिंग (Puddling): यह धान की खेती के शलए एक महत्र्पूणव प्र नक्रया है। इसमें बुर्ाई या रोपाई से
पहले खेत में पानी भरकर जुताई की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य धमट्टी की ननचली परतों को कठोर करके
पानी के ररसार् को रोकना और खरपतर्ारों को ननयंनत्रत करना है।
बीज िर (Seed Rate):
o त्त िड़काव तवत्तध (Broadcasting): 100 नकलोग्राम /हेक्टेयर
o रोपाई तवत्तध (Transplanting): 60-80 नकलोग्राम /हेक्टेयर
o शंकर धान (Hybrid rice): 15-20 नकलोग्राम /हेक्टेयर
Seed Rate (बीज की मात्रा)
• महीन धान के ललए — 30 kg/hec
• मोटे धान के ललए — 50 kg/hec
• मध्यम धान के ललए — 40 kg/hec
• संकर धान के ललए — 15 kg/hec
Distance (दूरी/पौधों का अंतर)
• संकर र् वर्ध — 20 × 15 cm
• देसी र् वर्ध — 20 × 10 cm
• SRI र् वर्ध — 25 × 25 cm

नसारी की तवत्तधयां :
o गीली क् यारी तवत्तध (Wet Bed Method): यह पारंपररक और सबसे आम नर्धध है।
o डेपोग तवत्तध (Dapog Method): यह नर्धध नफलीपींस से आई है। इसमें बीज बोने के केर्ल
11-14 दिन बाद पौधे रोपाई के शलए तैयार हो जाते हैं। इसमें 1.5 से 3 नकलोग्राम /र्गव मीटर की
बीज दर का उपयोग होता है।
o एसआरआई तवत्तध (SRI System - System of Rice Intensification): यह मेडागास्कर में
नर्कशसत एक आधुननक नर्धध है। इसमें पौधों को 25 x 25 सेमी की दू री पर लगाया जाता है। यह
नर्धध पानी और श्र म की बचत करती है।
पौध विधध (Planting Method)
• सीधी बुिाई विधध → दलदली िूलम/पलायनों (puddled fields) में बुवाई
• टेढी-मेढी भूमम (Terrace fields) में धान की खेती:
1. समतल खेत में बीज की बुवाई
▪ पादटयों में बुवाई (सीधी र् वर् ध)
2. ऊँची सतहों में धान की खेती
▪ पादटयों में बुवाई (सीधी र् वर् ध)
Transplanting (रोपाई)
• जब पौधे 20–25 ददन के हों तब रोपाई करनी चादहए।
• देर से लगातार जुताई ककए गए खेत में 20 × 25 cm की दूरी पर पौधों का रोपण करना
चादहए।
• पौधे की 2 पर्त्तयों का रोप करना चादहए।
Critical stages of Paddy (धान की मसंचाई की महत् िपूणण अिस् थाएाँ)
धान में 3 क् ांततक अवथथाएँ मानी जाती हैं जब नमी आवश्यक होती है:
1. रोपाई के समय — 7–10 ददन तक नमी बनी रहनी चादहए।
2. Flowering (फूल तनकलने के समय) — 20–30 ददन तक नमी आवश्यक होती है।
3. धान बनने के समय — 5–8 ददन तक नमी आवश्यक होती है।
Water Management (पानी प्र बंधन)
• रोपाई के दूसरे ददन खेत में लसंचाई करनी चादहए।
• बाद में जब जल थतर 5 cm तक कम हो जाए, तब लसंचाई करनी चादहए।
• खेती में िारी वषाि होने पर तनकासी करनी चादहए।
चािल संधान प्र णाली / SRI (System of Rice Intensification)
• मेडागाथकर में 1983 में Father Henri de Laulanié ने इस पद्धतत का उपयोग ककया।
• यह तकनीक जल बचाने और अर्धक उत्पादन देने वाली है।
• SRI पद्धतत को "System of Rice Intensification" कहा जाता है।
• िारत में कई थथानों पर इस पद्धतत से 7 –10 टन/हेक्टेयर उत्पादन ललया गया है।
Manure and Fertilizer (खाद एिं उिणरक)
• Dwarf variety (बौनी जातत)
o N = 120 kg/ha
o P = 60 kg/ha
o K = 50 kg/ha
• Desi variety (देशी जातत)
o N = 60 kg/ha
o P = 40 kg/ha
o K = 30 kg/ha
FYM • 10–15 टन प्र तत हेक्टेयर (सडी हुई गोबर की खाद) िूलम की तैयारी के समय डालना
लािकारी होता है।

मसंचाई (Irrigation)
• चार्ल की फसल को सबसे अधधक पानी की आर्श्यकता होती है, लगभग 900-2500 मममी (औसत
1200 धममी)।
• फसल के पूरे नर्कास के दौरान, खेत में 5 सेमी तक पानी भरा रहना चानहए। कटाई से 2-3 सप्ताह पहले
पानी हटा ददया जाता है।
कीट और रोर्ग प्र बंध नकीट (Insects)
और तनयंत्र ण
• पीला िना िेिक (Yellow Stem Borer - Tryporyza incertulas): यह पौधे के तने में छेद करके
नुकसान पहुंचाता है। इसके प्र कोप से डेड हाटा (dead heart) या व् हाइट इयर (white ear) जैसे लिण
ददखते हैं।
• धान का गांधी बग (Leptocorisa acuta): यह दू धधया अर्स्था में दानों का रस चूसता है, जजससे दाने
खाली रह जाते हैं।
• तनयंत्रण : कारिाप हाइड्रोक्लोराइड और मेलात्तथयॉन जैसे कीटनािकों का प्र योग नकया जाता है।
रोर्ग (Diseases)
और तनयंत्र ण
• धान का भूरा पिी धब्बा रोग (Brown Leaf Spot): यह हेल्ममनथोस्पोररयम ओराइजी कर्क के
कारण होता है। इस बीमारी के कारण 1943 में बंगाल में भीिण अकाल पडा था।
• धान का ब् लास्ट रोग (Blast Disease): यह पाइरीकुलेररया ओराइजी कर्क के कारण होता है और
हर्ा से फैलता है।
• खैरा रोग (Khaira Disease): यह जस्िे (Zinc) की कमी के कारण होने र् ाला एक िारीररक नर्कार है।
इसके लिण रोपाई के 2-3 सप्ताह बाद ददखते हैं। इसका उपचार 5 तकलोग्राम /हेक्टेयर जजिंक समफेट के
शछडकार् से होता है।
• धान का टुंग्रो रोग (Tungro Disease): यह एक वायरल रोग है जो हरी पिी हॉपर (Nephotettix
virescens) नामक कीट द्व ारा फैलता है। इसका पता ELISA test से लगाया जाता है।
झुलसा रोग (Blast disease)
• कारक: Pyricularia oryzae (फंगस)।
• यह रोग र् वशेषकर बासमती धान में लगता है।
• रोग का प्र कोप 20 –22°C तापमान और नमी की स् थथतत में अर्धक होता है।
लक्षण:
• पर्त्तयों पर छोटे -छोटे धब्बे बनते हैं।
• फसल कमजोर होकर उत्पादन घटता है।
उपचार:
• कैप्टान/कैप्टाफोल 500 gm
• 500–600 लीटर पानी में घोलकर तछडकाव करें।
Bacterial Leaf Blight (जीवाणु झुलसा रोग)
• कारक: Xanthomonas oryzae।
• यह रोग बैक्टीररया जतनत होता है।
• पर्त्तयों पर लंबे पीले धब्बे बनते हैं।
• रोग अर्धक वषाि और अर्धक नमी की स् थथतत में तेजी से फैलता है
Interculture and Weed Control (अंतरकिया एिं खरपतिार तनयंत्रण)
• धान की खेती वाले पंस्क्तबद्ध खेतों में ऊँची सतहों पर खरपतवार अर्धक उगते हैं।
• रोपाई के 20–25 ददन बाद पहली र्गु डाई/तनराई करनी चादहए।
• आवश्यकता पडने पर 40–45 ददन बाद दूसरी तनराई करनी चादहए।
• जहाँ पानी अच्छा रहता है वहाँ खरपतवारों को हाथ से उखाडा जाता है।
• पानी रदहत खेतों में खरपतवार तनयंत्रण के ललए रसायन प्र योग ककया जाता है, जैसे:
o 2,4-D,
o Saturn F-34 (प्र ोपीटोल) ,
o MCPA
• प्र मुख खरपिवार: इकाईनोक्लोआ कोलोना और इकाईनोक्लोआ क्रू सगमली धान के मुख्य
खरपतर्ार हैं।
• तनयंत्रण :
o बूसहेननिंग (Bhushening): इसमें रोपाई के बाद खेत में हल चलाकर खरपतर्ारों को ननकाला
जाता है।
o खरपिवारनाशी: प्र ोपेतनल (Propanil) का सबसे अधधक उपयोग नकया जाता है।
Harvesting and Threshing (कटाई एिं मडाई)
• कटाई का समय:
o बौनी जाततयाँ → 100–150 ददन
o बासमती ककथमें → 25–30 ददन बाद फूल तनकलने पर
• कटाई के बाद पौधों को धूप में सुखाकर मडाई करते हैं।
• मडाई हाथ से, बैल के पैरों से, या थ्रे शर मशीन से की जाती है।
• साफ़ अनाज को िंडारण हेतु सुरक्ष ित रखा जाता है।
Yield (उपज)
• देशी जाततयााँ → 25–30 स्क् वंटल/हेक्टेयर।
• उन्नतशील बौनी जाततयााँ → 40–50 स्क् वंटल/हेक्टेयर।